आपदा व्यवस्थापन

खराब को अच्छा बनाना

लोगों को कष्ट या संकट में देखना मेरा स्वभाव नहीं है, मैं विचलित हो जाता हूं । शायद मेरी सरकार ने भी इस बात को पहचान लिया था । यही कारण था कि जब भी कोई मानवीय या प्राकृतिक आपदा गुजरात में आती थी तो मुझे विशेष कार्यभार सौंप दिया जाता था । इसे देखते हुए मेरी बेटी, जो उस समय छोटी थी, भारी बरसात के दिनों में कई बार मुझसे पूछती थी कि पापा क्या आपको इस बार भी कहीं भेजा जाएगा? ऐसा इसलिए उसके मन में आता था क्योंकि ऐसा अक्सर होता था । ईश्वर की कृपा से सब कुछ अच्छे से हो भी जाता था – सो सब तव प्रताप रघुराई।

(दिसम्बर, 1992) सूरत शहर में सांप्रदायिक दंगे :

बाबरी मस्जिद गिरने के बाद गुजरात के सूरत शहर में हुए सांप्रदायिक दंगों ने पूरे देश को हिला दिया था । जान-माल का काफी नुकसान हुआ था। काफी गंभीर परिस्थितियां थीं । उस समय। मैं गुजरात सरकार में सहकारिता विभाग में कार्य करता था । एक दिन सुबह में मुझे अचानक कहा गया कि मैं सूरत पहुंच जाऊं और दंगों के पुनः स्थान पर कार्य करूं । मैंने वहां लगभग एक महीने तक कार्य किया ।

(जून, 1997) मेहसाणा जिले में बाढ़ का प्रकोप :-

मैं उस समय खेड़ा जिले के जिला मजिस्ट्रेट के रूप में कार्यरत था । खेड़ा जिले में उस समय गंभीर बाढ़ का प्रकोप था । उसी समय गुजरात के मेहसाणा जिले में भी बाढ़ का प्रकोप अति गंभीर होता दिखाई पड़ा और वहां के जिला मजिस्ट्रेट शायद छुट्टी पर थे । कुछ ही महीने पहले मैंने मेहसाणा के जिला मजिस्ट्रेट के रूप में काम किया था, इसलिए मुझे सरकार ने खेड़ा जिले का जिला मजिस्ट्रेट होते हुए भी मेहसाणा भेजा, जहां मैंने लगभग एक हफ्ते काम किया ।

(जून, 1997) खेड़ा जिले में भयंकर बाढ़ :

खेड़ा जिले का बाढ़ का प्रकोप बढ़ता गया और मैं मेहसाणा से वापस आया । मैंने स्वयं बचाव और राहत की कमान संभाली और व्यक्तिगत रूप से कई बचाव कार्यक्रमों में नेतृत्व किया । बाढ़ के पानी में नाव पर पुलिस एवं सेना के जवानों के साथ स्वयं जाकर बहुत से लोगों को बचाया। यह आवश्यक परंतु जोखिम भरा काम था । राज्य सरकार ने इस काम की लिखित में प्रशंसा भी की ।

(अक्तूबर, 1997) खेड़ा जिले का विभाजन :-

राज्य सरकार के आदेशानुसार सितम्बर, 1997 के अंतिम दिनों में खेड़ा जिले का विभाजन किया गया और 02 अक्तूबर के प्रभाव से एक नया जिला ‘आनंद’ की रचना होने वाली थी । साथ ही ऐतिहासिक खेड़ा जिले का मुख्यालय भी खेड़ा से बदलकर नाडियाद कस्बे में किया गया । इस निर्णय के विरुद्ध स्थानीय खेड़ा निवासियों ने काफी विरोध प्रदर्शन किया और दंगे भी हुए; फिर भी सरकार के इस निर्णय का पालन एवं अमल किया गया । उसके बाद मेरी ही इच्छा के मुताबिक राज्य सरकार ने मुझे आनंद जिले का जिला मजिस्ट्रेट नियुक्त किया । जहां जाकर नये जिले के मुख्यालय की स्थापना की । नाडियाद में भी ऐसी ही व्यवस्था की ।

(अगस्त, 1998) सूरत शहर में बाढ़ का प्रकोप :-

तापी नदी में आयी बाढ़ के कारण सूरत शहर में काफी पानी घुस चुका था । साथ ही सूरत शहर में 1994 में हुई प्लेग महामारी का भय भी सता रहा था । राज्य सरकार सूरत शहर को लेकर बहुत चिंतित थी । मुझे बाढ़ नियंत्रण में काम करने के लिए वहां भेजा गया, जहां मैंने 15 दिनों से ज्यादा काम किया था ।

(फरवरी, 1999) :-

गुजरात का सरदार सरोवर नर्मदा बांध बहुत ही प्रख्यात एवं चर्चित प्रोजेक्ट रहा है । 1960 में इसकी नींव पड़ने के बाद कई दशकों तक इसका कार्य रुका रहा । बहुत सारी बाधाएं इसके मार्ग में थी, जिनमें विशेष रूप से योजना से प्रभावित लोगों का पुनर्वसन एवं स्थापना था । इस रुकावट के चलते न सिर्फ प्रोजेक्ट की कीमत बढ़ रही थी, बल्कि गुजरात की प्यासी जनता एवं सूखे क्षेत्र को पानी से भी वंचित होना पड़ रहा था । गुजरात, महाराष्ट्र एवं मध्य प्रदेश को संभावित जल विद्युत से भी वंचित होना पड़ा रहा था ।

बहुत से परिबल इस योजना के विरुद्ध में थे और माननीय सर्वोच्च न्यायालय में बहुत सारी शिकायतें एवं केस भी दर्ज थे । इन मुद्दों के निपटारे के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने एक फरियाद निवारण ऑथोरिटी की रचना की, जिसके अध्यक्ष हाई कोर्ट के एक निवृत्त मुख्य न्यायाधीश थे । अचानक मुझे और कुछ और अधिकारियों को इस ऑथोरिटी में काम करने के लिए नियुक्त कर दिया गया। हम लोगों ने इस प्रोजेक्ट पर 2 साल से अधिक समय तक काम किया । इसी कार्य के मद्देनज़र माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने अक्तूबर, 2000 में नर्मदा बाँध को आगे बनाने की मंजूरी प्रदान की । इस मील के पत्थर रूपी कार्य के चलते आज नर्मदा बाँध संपूर्ण होकर खड़ा है एवं उसके इर्द-गिर्द अन्य प्रकार के विकास भी हो रहे हैं, जिसमें ‘स्टेच्यू ऑफ यूनिटी’ भी शामिल है ।

(जनवरी, 2001) भूकंप में राहत कार्य :-

26 जनवरी, 2001 को शायद इस सदी का सबसे भयानक भूकंप आया था, जिसने विशेषकर के गुजरात के कच्छ एवं सौराष्ट्र क्षेत्र को प्रभावित किया था । लाखों मकान, भवन एवं ढांचे गिर गए थे । हजारों लोगों की मृत्यु हुई थी एवं लाखों लोग घायल हुए थे । अनाथों और विधवाओं को लेकर बड़ी समस्या खड़ी हुई थी । संपत्ति का भारी नुकसान हुआ था और कच्छ जैसे सूखे क्षेत्र में आजीविका का प्रश्न भी खड़ा हो गया था । नर्मदा की ऑथोरिटी में काम करते हुए मुझे भूकंप प्रभावित कच्छ जिले की रापर तहसील का जिम्मा सौंपा गया, जो बुरी तरह प्रभावित तहसीलों में से एक था । मैं लगभग 3 महीने तक वहां रहकर काम करता रहा और कठिन परिस्थितियों में पूरी टीम का मनोबल बढ़ाते हुए लोगों को राहत पहुंचाई गई । उस समय मकानों और भवनों के धराशायी एवं जर्जर हो जाने के कारण हम लोग जमीन पर सोते थे और ठंडी से बचने के लिए आग तापते थे । 3 महीने तक वहां कार्य करने के बाद मुझे राज्य मुख्यालय में उद्योग विभाग के संयुक्त कमीश्नर के रूप में नियुक्ति मिली । उस दरम्यान भी मैं इस कार्य से जुड़ा रहा एवं भूकंप प्रभावित उद्योगों के पुनर्स्थापन तथा रापर की नई नगर रचना के लिए कार्य किया । साथ ही अन्य उद्योगों की स्थापना करके रोजी-रोटी के प्रश्न का निवारण करने की दिशा में भी पहल की गई ।

आपदा प्रबंधन के ये कुछ प्रमुख उदाहरण हैं । इस तरह के अन्य भी कई प्रसंग बने थे ।

विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे, जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये ।
अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि, गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानी ॥
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