समग्र पृष्ठभूमि

ऐ मालिक तेरे बंदे हम !

मुझे इस बात के लिए ज्यादा सोचना नहीं पड़ता कि मैं शिव और शक्ति की संतान हूं । इतना लम्बा सोचने कि जरुरत ही नहीं क्योंकि हमारे पिता जी साक्षात शिव स्वरूप थे । उनका नाम भी स्व. श्री शिवमूर्ति शर्मा स्वयं स्पष्ट है । मेरी मां भी मूल प्रकृति की तरह सरलता की प्रतिमूर्ति थीं । उनका नाम स्व. श्रीमती शांति शर्मा भी यही बताता है –

या देवी सर्व भूतेषु शांति रूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।।

मां तो प्रथम गुरु है ही; विश्व गुरु के स्वरूप में हमारे पिता जी मेरे निरंतर साथी, मित्र, पथ प्रदर्शक एवं मार्गदर्शक थे । यूँ कहूं तो सब कुछ थे ।

मिडिल स्कूल की पढ़ाई बलिया जिले के अमर शहीद भगत सिंह इंटर कॉलेज रसड़ा से किया । हाईस्कूल और इंटर डीएवी इंटर कॉलेज मऊ से किया । उस दरम्यान मऊ में पिता जी के साथ रुकता था और कभी-कभार गांव से भी आता-जाता था । गांव आने पर घर के सब कार्य करता था; ख़ास करके पशुओं को खिलाना, द्वार पर खरहर चलाकर सफाई करना, घर का नाली-नाबदान साफ़ करना, कुछ खेती से संबंधित कार्य, जैसे मौसमी, पौधे एवं सब्जी वगैरह लगाना । ग्रेजुएशन एवं पोस्ट- ग्रेजुएशन के दरम्यान भी यह क्रम चलता रहा । मैं इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए दो तीन महीने पर घर आता ही था । गांव आने पर इन कार्यों में मन भी लगता था । 

बचपन की दिनचर्या सुबह पिताजी के पढ़ाने से शुरू होती थी और मैं प्रेम से कभी-कभी उनका पैर दबाता था । मां का प्यार, बुआ, चाची या भाभी का खाना लेकर पीछा करना; बड़ी बहन के साथ पढ़ाई करना ये नित्य क्रियाएं थी । मुझे अपने बड़ों का सम्मान करने का शौक था और घर के लोग बड़ों के पैर छूने को प्रोत्साहित भी करते थे ।  इसलिए गुरुजनों, पंडित जी और बड़ों के पैर छूना और कुलदेवता के यहां शीश झुकाना नित्य कार्यक्रम जैसा था । काली माई या कुलदेवी देइया माई के यहां जाकर खेलना ये सब अभी भी याद है । ख़ास करके हलवा, पूड़ी और सब्जी के उस प्रसाद का स्वाद नहीं भूलता । हमारे परिवार पर ईश्वर की बड़ी कृपा रही है और कुल देवी-देवता एवं पूर्वजों का अनुग्रह उस कृपा का वाहक है ।

पिताजी का चलते-फिरते ‘नमामीशमीशान निर्वाण रूपं – रुद्राष्टकम का पाठ करते रहना, माताजी का सूर्य नारायण भगवान को रोज सुबह जल देना और माँ जगदम्बा की छोटी सी फोटो को प्रणाम करना, जहां भी शिव मंदिर दिखे सिर झुकाना, घर और गांव में सत्य नारायण भगवान की कथा और बगल वाले चाचा का रामचरित मानस का पाठ – इसको मैं जीवन का अमृत मानता हूँ, जो मुझे शक्ति देता है और देता रहेगा ।

आंधी में पेड़ से गिरे हुए आम बटोरना, खेत में से उखाड़कर गन्ना चूसना, मटर और चने का होरहा फूंकना, कड़ाही में बनते हुए गुड़ की महिया खाना, गाँव में जिसको होली में रंग लगाना बिलकुल पसंद नहीं था, उनको जरूर रंग डालना ! ये सब सिलसिला बहुत वर्षों तक चलता रहा । उस रोमांच का आज तक कोई सामानांतर नहीं मिला मुझे जीवन में ।

आईएएस में चुने जाने के एक साल पहले मेरी शादी मेरी प्रिय पत्नी से हुई । शादी के पहले मैंने उन्हें देखा या मिला नहीं था । अचानक एक दिन इसके बारे में मुझे बता दिया गया । मुझे लगा कि मेरी पसंदीदा ग़ज़लों में से एक, फिराक गोरखपुरी कि ग़ज़ल जो जगजीत-चित्रा सिंह ने बखूबी गायी है, वो मेरे जीवन में चरितार्थ हो रही है-

तुझे ज़िन्दगी, हम दूर से पहचान लेते हैं

आईएएस में चुने जाने के बाद मेरे पिताजी कहते थे कि यह सब तो मेरी पत्नी के भाग्य से ही हुआ है । जैसे कि यह पर्याप्त नहीं था आईएएस परीक्षा का परिणाम जिस दिन आया उसी दिन मेरे पुत्र का जन्म भी हुआ और वो भी रामनवमी के दिन । स्पष्ट रूप से यह माँ जगदम्बा के विशेष अनुग्रह सहित दैवी कृपा थी और इसलिए मैं स्वयं इस बारे में कभी बड़बोला नहीं रहा ।

बाद में हमें एक लक्ष्मी स्वरूप पुत्री भी प्राप्त हुई, जो मेरी गाइड, सखा और साथी है; और मुझे संयम दिलाती रहती है । मुझे ऐसा लगता है कि भगवान शिव काशी के साथ साथ मेरे घर को भी अपने त्रिशूल पर रखते हैं । इसीलिए मेरी प्रिय पुत्री की शादी काशी में ही एक संभ्रांत परिवार में एवं सुन्दर तथा सुशील लड़के के साथ हुई ।

श्रेय और प्रेय के बीच क्या चुनना चाहिए इसके सबसे बड़े शिक्षक मेरे मां-पिता जी, मेरा परिवार एवं ग्रामजन हैं ।
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