पछतावा नहीं

कार्य ही पूजा

लोक कर्त्तव्य एवं पारिवारिक जीवन में संतुलन का अभाव एक सर्वव्यापी समस्या है । मेरे जीवन में यह थोड़ा ज्यादा ही रहा है । मेरी पत्नी इसकी शिकायत करती रहती हैं; लेकिन मैं इसे शिकायत नहीं शाबाशी मानता हूं । मैं लोकसेवा के काम के लिए समय देने में ना नहीं बोल पाता; हाँ उसके चलते परिवार ने जो गंवाया उसकी क्षतिपूर्ति भी संभव नहीं है ।

लेकिन मेरे पास इस परिस्थिति के लिए तर्क है । सत्य यह है कि मुझे काम में ही आनंद आता है और लोगों के लिए काम करने में संतोष मिलता है । लोकसेवा करते हुए ऐसा लगता है मैं अपने ही लोगों की सेवा कर रहा हूँ । आईएएस की नौकरी में मैंने सभी भूमिकाएं इसी भावना के साथ निभाईं हैं ।

जिगर मुरादाबादी ने बखूबी कहा है:

इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है,
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है II
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