ग्रामीण मूल

गाँव, ग्रामवासी एवं गुण

मैं पूर्वी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण क्षेत्र के कृषक परिवार से आता हूँ । गांव में हमारा पुस्तैनी मकान एवं जमीन है । वहां हमारे परिवारजन रहते हैं और खेतीबाड़ी भी होती है । मुझे याद है कि हम लोग अपनी शुरुआती पढ़ाई मिट्टी के तेल के दीये (ढिबरी) के नीचे करते थे । यह भी याद है कि हमारे पिता जी ने गांव में पहला ट्यूबवेल लगाया, तब बिजली गांव में आयी । उसके बाद कई ट्यूबवेल लगे फिर भी घरों में बिजली तो बहुत बाद में आयी । हम लोग हाई स्कूल और इंटर तक की पढ़ाई  दीये या फिर लालटेन के नीचे ही करते थे । रेलवे लाइन थी, गाड़ियां तो दौड़ती थी लेकिन रुकती नहीं थी । हमारे पिता जी और गांव के अन्य वरिष्ठों के प्रयास से एक हाल्ट स्टेशन बना और गाड़ियां रुकने लगी । हमारे घर के पीछे ही है हॉल्ट स्टेशन, जिसका नाम पलिगढ़ हॉल्ट पड़ा है क्योंकि उस समय पोस्ट ऑफिस वहीं हुआ करता था । हमारे पिता जी दूरदृष्टा थे । उन्होंने सक्रिय होकर गांव में एक हॉयर सेकेंड्री स्कूल भी शुरू करवाया, जो पंडित अलगू राय शास्त्री जी के नाम पर है । थोड़ा-थोड़ा याद आता है, जब पिताजी ने गांव की प्राथमिक पाठशाला में मेरा पहला दाख़िला कराया था । हमारी ज्यादातर प्राथमिक शिक्षा यहीं हुई । कुछ भाग खुरहट में भी हुई क्योंकि हमारे चाचाजी वहां शिक्षक थे और मुझे कुछ समय के लिए वहां ले गए थे । १९९०-९१ तक हमारे गांव में सड़क नहीं थी । हॉयर सेकेंड्री तक हम लोग साइकिल से स्कूल जाते थे । आईएएस में मेरी नौकरी लगने के बाद मैंने स्थानीय अधिकारियों से बात करके रोड बनवायाI अब संपर्क रास्ता बन गया है । याद आता है कि हमारे घर पर लोग जुटते थे और इन विषयों पर काफी चर्चाएं हुआ करती थी मैं उन सबको चाय-पानी पिलाया करता था । आईएएस में अपनी नौकरी के दरम्यान भी मैं अपने गांव, स्थानिक समाज एवं परिवार से जुड़ा रहा । मौके-दर-मौके मैं गांव आता- जाता रहा हूं । सच पूछिए तो मुझे अच्छा लगता है वहां रहनाI एक कमी अब यह है कि मेरे माता और पिताजी अब नहीं रहे । मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे अपने परिवार सहित पूरे गांव का प्रेम और स्नेह मिलता रहा है और वही मेरा मनोबल भी रहा है । परिवारजनों के अलावा भी कई लोग हैं, जो मेरे जीवन में बहुत महत्व रखते हैं । पिता जी उत्तर प्रदेश सड़क परिवहन में नौकरी करते थे । इसलिए मेरे बचपन का काफी भाग दो बस स्टेशनों (मऊ और रसड़ा ) पर गुजरा है । मेरी मां गांव में ही रहती थीं । कक्षा छठी से बारहवीं तक की पढ़ाई के दरम्यान मैं पिताजी के साथ अकेला ही रहता था । इन जगहों के वे सभी लोग जिनमें चाय और मिठाई वाले, ड्राइवर, कंडक्टर और कुली भी हैं; उन सबका मेरे जीवन में बहुत योगदान है । इसके साथ ही बचपन के उन कोमल और शुरुआती दिनों में ही और बहुत कुछ सीखने को मिला । नौकरी के चक्कर में पिताजी अक्सर बाहर चले जाते थे । दिन का खाना घाठी, अमरुद, मूंगफली, चाय, समोसा जैसी चीजों पर ही निर्भर था । लेकिन रात में भोजन में मजा आता था । भगवान भोलेनाथ की धुनि रमती थी । गोइठा/उपला पर अक्सर एक दर्जन से ज्यादा लोगों का खाना बनता था और खाने के समय तक आधे दर्जन और जुड़ जाते थे । लिट्टी/ भौरी-चोखा ही सामान्य भोजन होता था । जितने लोगों का खाना बनता उससे डेढ़ा लोग खाते थे और उसके ऊपर से बस स्टेशन के कुली और भूले भटके लोग भी होते थे । उनमें से ज्यादा लोग दिन में बिना खाये वाले होते थे । लेकिन खाना कभी कम नहीं होता थाI शायद मां अन्नपूर्णा हमेशा वहां उपस्थित रहतीं थीं और अगर कभी ऐसा लगे की कम पड़ ही जायेगा तो हमारे आशुतोष स्वरूप पिताजी सबसे पहले कहते थे कि “आज मेरा मन नहीं है खाने का; थोड़ा ही देना”। संतोष क्या होता है; दूसरे का ध्यान रखना और बांटना कैसे सम्पूर्णता लाता है, उसका पहला पाठ मुझे यहीं सीखने को मिला ।
उन सब ईश्वर स्वरूप लोगों को जिन्होंने मुझे पाला-पोषा और मैं जो कुछ भी हूँ वो बनाया..
‘करहुं प्रणाम जोरि जुग पानी’
Choose Your Language
Choose Your Language